Monday, September 26, 2022
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चित्रगुप्त चालीसा Chitragupt Chalisa. Mantra for clearing past sins.

This is a powerful mantra to make sure you do not suffer in this life because of mistakes in past.

चित्रगुप्त चालीसा का जो भी भक्त सच्चे हृदय से पाठ करता है उसे नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। साथ ही इस जीवन में भी वह धन-संपत्ति सरलता से प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है। कहते हैं कि श्रद्धावान व्यक्ति यदि श्री चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) का नियमित पाठ करता है तो उसके सभी पाप सहज ही कट जाते हैं। मान्यता है कि चित्रगुप्त जी स्वयं त्रिदेवों में प्रथम ब्रह्मा जी के अंश से प्रकट हुए हैं। वे धर्मराज के कार्य में सहायक हैं जिससे संसार-चक्र नियत विधान के साथ गतिशील रहता है। उनका पूजन व्यापार में वृद्धि देने वाला है तथा कष्टों से छुटकारा दिलाने में सक्षम है। पूजन के पश्चात चित्रगुप्त जी की आरती गाने का भी विधान है। पढ़ें चित्रगुप्त चालीसा–

॥ दोहा ॥
सुमिर चित्रगुप्त ईश को,
सतत नवाऊ शीश।
ब्रह्मा विष्णु महेश सह,
रिनिहा भए जगदीश॥

करो कृपा करिवर वदन,
जो सरशुती सहाय।
चित्रगुप्त जस विमलयश,
वंदन गुरूपद लाय॥

॥ चौपाई ॥
जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर।
जय यमेश दिगंत उजागर॥

अज सहाय अवतरेउ गुसांई।
कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई॥

श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा।
भांति-भांति के जीवन राचा॥

अज की रचना मानव संदर।
मानव मति अज होइ निरूत्तर॥

भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई।
धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई॥

राचेउ धरम धरम जग मांही।
धर्म अवतार लेत तुम पांही॥

अहम विवेकइ तुमहि विधाता।
निज सत्ता पा करहिं कुघाता॥

श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी।
त्रय देवन कर शक्ति समानी॥

पाप मृत्यु जग में तुम लाए।
भयका भूत सकल जग छाए॥

महाकाल के तुम हो साक्षी।
ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी॥

धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो।
कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो॥

राम धर्म हित जग पगु धारे।
मानवगुण सदगुण अति प्यारे॥

विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें।
पालन धर्म करम शुचि साजे॥

महादेव के तुम त्रय लोचन।
प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन॥

सावित्री पर कृपा निराली।
विद्यानिधि माँ सब जग आली॥

रमा भाल पर कर अति दाया।
श्रीनिधि अगम अकूत अगाया॥

ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो।
जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो॥

गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा।
जाके कर्म गहइ तव हाथा॥

रावण कंस सकल मतवारे।
तव प्रताप सब सरग सिधारे॥

प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा।
सोउ करत तुम्हारी सेवा॥

रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी।
विघ्न हरण शुभ काज संवारी॥

व्यास चहइ रच वेद पुराना।
गणपति लिपिबध हितमन ठाना॥

पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा।
असवर देय जगत कृत कीन्हा॥

लेखनि मसि सह कागद कोरा।
तव प्रताप अजु जगत मझोरा॥

विद्या विनय पराक्रम भारी।
तुम आधार जगत आभारी॥

द्वादस पूत जगत अस लाए।
राशी चक्र आधार सुहाए॥

जस पूता तस राशि रचाना।
ज्योतिष केतुम जनक महाना॥

तिथी लगन होरा दिग्दर्शन।
चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन॥

राशी नखत जो जातक धारे।
धरम करम फल तुमहि अधारे॥

राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई।
प्रथम गुरू महिमा गुण गाई॥

श्री गणेश तव बंदन कीना।
कर्म अकर्म तुमहि आधीना॥

देववृत जप तप वृत कीन्हा।
इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा॥

धर्महीन सौदास कुराजा।
तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा॥

हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा।
कायथ परिजन परम पितामा॥

शुर शुयशमा बन जामाता।
क्षत्रिय विप्र सकल आदाता॥

जय जय चित्रगुप्त गुसांई।
गुरूवर गुरू पद पाय सहाई॥

जो शत पाठ करइ चालीसा।
जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा॥

विनय करैं कुलदीप शुवेशा।
राख पिता सम नेह हमेशा॥

॥ दोहा ॥
ज्ञान कलम, मसि सरस्वती,
अंबर है मसिपात्र।
कालचक्र की पुस्तिका,
सदा रखे दंडास्त्र॥

पाप पुन्य लेखा करन,
धार्यो चित्र स्वरूप।
श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा,
सरग नरक कर भूप॥

॥ इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त॥

विदेशों में बसे कुछ हिंदू स्वजनों के आग्रह पर श्री चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) को हम रोमन में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है कि वे इससे अवश्य लाभान्वित होंगे। पढ़ें श्री चित्रगुप्त चालीसा रोमन में–

॥ dohā ॥
sumira citragupta īśa ko,
satata navāū śīśa।
brahmā viṣṇu maheśa saha,
rinihā bhae jagadīśa॥

karo kṛpā karivara vadana,
jo saraśutī sahāya।
citragupta jasa vimalayaśa,
vaṃdana gurūpada lāya॥

॥ caupāī ॥
jaya citragupta jñāna ratnākara।
jaya yameśa digaṃta ujāgara॥

aja sahāya avatareu gusāṃī।
kīnheu kāja bramha kīnāī॥

śrṛṣṭi sṛjanahita ajamana jāṃcā।
bhāṃti-bhāṃti ke jīvana rācā॥

aja kī racanā mānava saṃdara।
mānava mati aja hoi nirūttara॥

bhae prakaṭa citragupta sahāī।
dharmādharma guṇa jñāna karāī॥

rāceu dharama dharama jaga māṃhī।
dharma avatāra leta tuma pāṃhī॥

ahama vivekai tumahi vidhātā।
nija sattā pā karahiṃ kughātā॥

śraṣṭi saṃtulana ke tuma svāmī।
traya devana kara śakti samānī॥

pāpa mṛtyu jaga meṃ tuma lāe।
bhayakā bhūta sakala jaga chāe॥

mahākāla ke tuma ho sākṣī।
bramhau marana na jāna mīnākṣī॥

dharma kṛṣṇa tuma jaga upajāyo।
karma kṣetra guṇa jñāna karāyo॥

rāma dharma hita jaga pagu dhāre।
mānavaguṇa sadaguṇa ati pyāre॥

viṣṇu cakra para tumahi virājeṃ।
pālana dharma karama śuci sāje॥

mahādeva ke tuma traya locana।
prerakaśiva asa tāṇḍava nartana॥

sāvitrī para kṛpā nirālī।
vidyānidhi mā~ saba jaga ālī॥

ramā bhāla para kara ati dāyā।
śrīnidhi agama akūta agāyā॥

ūmā vica śakti śuci rācyo।
jākebina śiva śava jaga bācyo॥

gurū bṛhaspati sura pati nāthā।
jāke karma gahai tava hāthā॥

rāvaṇa kaṃsa sakala matavāre।
tava pratāpa saba saraga sidhāre॥

pratham pūjya gaṇapati mahadevā।
sou karata tumhārī sevā॥

riddhi siddhi pāya dvainārī।
vighna haraṇa śubha kāja saṃvārī॥

vyāsa cahai raca veda purānā।
gaṇapati lipibadha hitamana ṭhānā॥

pothī masi śuci lekhanī dīnhā।
asavara deya jagata kṛta kīnhā॥

lekhani masi saha kāgada korā।
tava pratāpa aju jagata majhorā॥

vidyā vinaya parākrama bhārī।
tuma ādhāra jagata ābhārī॥

dvādasa pūta jagata asa lāe।
rāśī cakra ādhāra suhāe॥

jasa pūtā tasa rāśi racānā।
jyotiṣa ketuma janaka mahānā॥

tithī lagana horā digdarśana।
cāri aṣṭa citrāṃśa sudarśana॥

rāśī nakhata jo jātaka dhāre।
dharama karama phala tumahi adhāre॥

rāma kṛṣṇa gurūvara gṛha jāī।
prathama gurū mahimā guṇa gāī॥

śrī gaṇeśa tava baṃdana kīnā।
karma akarma tumahi ādhīnā॥

devavṛta japa tapa vṛta kīnhā।
icchā mṛtyu parama vara dīnhā॥

dharmahīna saudāsa kurājā।
tapa tumhāra baikuṇṭha virājā॥

hari pada dīnha dharma hari nāmā।
kāyatha parijana parama pitāmā॥

śura śuyaśamā bana jāmātā।
kṣatriya vipra sakala ādātā॥

jaya jaya citragupta gusāṃī।
gurūvara gurū pada pāya sahāī॥

jo śata pāṭha karai cālīsā।
janmamaraṇa duḥkha kaṭai kalesā॥

vinaya karaiṃ kuladīpa śuveśā।
rākha pitā sama neha hameśā॥

॥ dohā ॥
jñāna kalama, masi sarasvatī,
aṃbara hai masipātra।
kālacakra kī pustikā,
sadā rakhe daṃḍāstra॥

pāpa punya lekhā karana,
dhāryo citra svarūpa।
śrṛṣṭisaṃtulana svāmīsadā,
saraga naraka kara bhūpa॥

॥ iti śrī citragupta cālīsā samāpta॥

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