व्यावहारिक अर्थशास्त्र के पास कई जवाब हैं इस सवाल के लिए की क्यूँ एक व्यक्ति किसी परिस्थिति में किसी एक विकल्प का चुनाव करता है | अक्सर वही परेशानी जब लोगों के सामने अलग रूप से आती है तो उनका चुनाव भी बदल जाता है |

क्या गरीब बच्चो को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए ?

किसी भी समझदार व्यक्ति से ये सवाल करेंगे तो वह इसका जवाब हाँ में देगा |हम सभी चाहते हैं की गरीब लोगों को भी बढ़िया शिक्षा प्राप्त हो |यही कह कर तो नेता और मीडिया इस मुश्किल मुद्दे का हल ढूँढ़ते हैं |ये एक आसान सा सवाल है जो सभी लोगों के समझ में आ जाता है |इस सवाल को पूछने में हमें 5 सेकंड लगते हैं और लोगों को उसका जवाब देने में 2 सेकंड |कई नेता इस मुद्दे को समर्थन दे “ गरीबों को अच्छी शिक्षा देंगे”  जैसे नारे लगाते हैं |कुछ नियम पारित हो जाते हैं और लोग खुशियाँ मनाते हैं |

हम इस क़ानून की मुख्य बातों को एक बार नीचे लिख रहे हैं |

  • सरकार सिर्फ उन स्कूल का चुनाव करती हैं जिनके संस्थापक हिन्दू हैं | फिर वह कई ऐसे नियम बना देती है जिनके अन्तरगत राज्य शिक्षा विभाग को इन स्कूल से जुड़े सभी फैसले लिए जायेंगे जैसे वो कैसे चलाये जायेंगे , उनकी फीस क्या होगी और दाखिला की शर्तें क्या होंगी |
  • अगर कोई स्कूल सब नियमों का पालन नहीं कर पाता है तो वह पूर्ण रूप से सरकार द्वारा बंद कर दिया जायेगा | सरकार उस पर अधिकारिक तौर पर कब्ज़ा भी कर सकती है |
  • सरकार उन स्कूल की 25 % सीट अपने लिए आरक्षित कर लेती है | इसका मतलब की बाकी के 75 % की सीटों के बच्चों को 25% सीटों का खर्चा भी उठानी पड़ती है |
  • इन 25 % सीटों को ड्रा के द्वारा विभिन्न जाती के बच्चों में बाँट दिया जाता है |इस फैसले में  न तो छात्र का न ही स्कूल का कोई हाथ होता है |
  • सरकार बाकि की 75% सीटों पर भी अपना अधिकार रखती है |बस ये फर्क है की इन सीटों को किसी एक जाती के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकता और छात्रों को इसके लिए खुद आवेदन देना पड़ता है |
  • अगर सरकार इन 25% सीटों को भर नहीं पाती है तो ये हर साल खाली छोड़ डी जाएँगी मतलब की ये फिर आंठ्वी कक्षा तक नहीं भरी जा सकती हैं |
  • शिक्षा का अधिकार (RTE) सभी हिन्दू स्कूल के लिए लाज़मी है |फिर चाहे उसे बाहरी सहायता प्राप्त हो या नही| ये किसी ईसाई/मुस्लिम/जैन स्कूल के लिए मान्य नहीं है |

वापस से उसी सवाल पर आते हैं “क्या गरीब बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलनी चाहिए” ? क्या लोगों को लगता है शिक्षा का अधिकार (RTE) इस सवाल का जवाब है | शायद नहीं क्यूंकि वह तो धार्मिक भेदभाव के माध्यम से और कई मुद्दों को खड़ा कर रहा है |

हांलाकि शिक्षा का अधिकार (RTE) की सभी बातें गलत हैं लेकिन इसका सिर्फ हिन्दू स्कूल पर लागू होना सबसे गलत है |सभी ईसाई ,मुस्लिम और एनी धर्म के स्कूल इसके अंतर्गत नहीं आते हैं |गोवा जैसे राज्य में 50% से ज्यादा स्कूल की देखरेख चर्च के अन्दर होती है |केरल में ये अंक और भी ज्यादा है |

शिक्षा का अधिकार (RTE) की वजह से हिन्दुओं को देखिये क्या क्या सहना पड़ता है |

  • वह अपने स्कूल को व्यवस्थित तौर पर नहीं चला पाते हैं | शिक्षा का अधिकार (RTE) के मुताबिक हर स्कूल में छात्र और शिक्षक का अनुपात 30:1 होना चाहिए|अब सोचिये की एक ईसाई स्कूल जो चर्च के अंदर है और एक हिन्दू स्कूल में किसके के खर्चे कम होंगे | अगर पैसे की कमी हुई तो कौनसे स्कूल बंद होने की सम्भावना ज्यादा है |
  • वह उत्कृष्टता और विशेषता वाले स्कूल नहीं बना सकते है |मान लीजिये एक दलित उद्यमी अपने गाँव में दलितों के लिए स्कूल खोलना चाहता है |वह 100 % क्या 10% आरक्षण भी अपने दलित भाइयों को नहीं दे सकता है |use सरकार द्वारा स्थापित नियमों के मुताबिक ही अपना स्कूल चलाना होगा |

 

चर्च द्वारा चलाये गए स्कूल किसी भी दाखिला दे सकते हैं |

 

  • हिन्दू विशेष संस्थानों नहीं बना सकते हैं |एक हिन्दू एक विश्व में सर्वोच्च संस्था जो की सिर्फ 135 से ऊपर के IQ वाले छात्रों को दाखिला दे की स्थापना नहीं कर सकता है |दूसरी तरफ एक चर्च के अन्तरगत आने वाला स्कूल ऐसा कर सकता है |
  • प्रतिष्ठित व्यक्ति, अमीर लोगों, सरकारी अधिकारियों, नेताओं अपने बच्चों को प्राइवेट RTE वाले स्कूल में न भेज अल्पसख्यक स्कूल में भेज रहे है | ठाकरे परिवार बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल में, केजरीवाल की बेटी डी पी एस और देवेन्द्र फद्नाविस की बेटी भवन्स में पढाई कर रहे हैं | जैसे ये बच्चे बढे होकर लोकप्रिय होंगे वह अपने स्कूल की मदद भी करेंगे | ये फायदा हिन्दू स्कूल को नहीं प्राप्त होगा |
  • शिक्षा का अधिकार (RTE) स्कूल की संख्या या उसकी क्षमता नहीं बढ़ा रहा है | ये तो ऐसा है की एक से चुरा के दुसरे को दे दो |
  • जैसे अपने ध्यान दिया होगा 25 % सीट एक जाती के बच्चों के लिए आरक्षित करना उसे गरीब बच्चों के लिए आरक्षित रखने जैसा नहीं है | सरकार सिर्फ जाती के खातिर इन 25% सीटों को सामान्य जाती को प्राप्त नहीं होने दे रही है | इससे छात्रों के समुदाय को कोई फायदा नहीं होता क्यूंकि बचे हुए 25 % छात्रों को फिर भी नए स्कूल की तलाश करनी पड़ती है |
  • इन कठिन नियमों से सिर्फ सीट की संख्या कम हो रही है जिससे स्कूल बंद करने की नौबत आ जाती है | इससे सीटों की कुल संख्या कम हो जाती है | अब तक भारत में 3000 से ज्यादा स्कूल बंद हो चुके हैं |
  • हिन्दुओं के मौलिक अधिकारों का खनन
  • शिक्षा का अधिकार (RTE)सुप्रीम कोर्ट को टी एम् ऐ पाई वेर्सेस स्टेट ऑफ़ कर्नाटका केस में असंवैधानिक लगा था |भारतीय संविधान लोगों को अपनी जीविका चुनने का पूरा अधिकार देता है | UPA सरकार के राज्य में 93 संविधान में संशोधन लाया गया था | इसके बाद हिन्दुओं को अपनी पसंद की जीविका चुनने का अधिकार उनसे ले लिया गया |

 

  • आम बचाव
  • “ मुझे कोई परेशानी है थोडा ज्यादा देने में अगर उससे कोई गरीब बच्चा मेरे बच्चे के स्कूल में पड़ पाए | 25 % आरक्षण इतनी बड़ी समस्या क्यूँ है ?”
  • स्वैच्छिक दान और मजबूर जबरन वसूली दो अलग चीज़ें है | मान लीजिये आपके पास किराये पर उठाने के लिए दो घर हैं | सरकार एक “घर का अधिकार “ लेकर आती है और फिर ये मांग रखती है की आप एक माकन बिना किराया लिए उठा दें | आपके पास दुसरे माकन का किराया ज्यादा कर उसे उठा देने के इलावा कोई और चारा नहीं है | इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की दुसरे व्यक्ति की इसमें रजामंदी है की नहीं , इस तरह सरकार आपसे आपका मकान छीन रही है |
  • इसके इलावा जिन लोगों को सरकार आपके घर में रहने के लिए भेज रही है वह भी कई समस्या खड़ी कर सकते हैं | अगर सरकार मकान किराये पर उठाती है तो आप उसको सिर्फ कुंवारों, या शादी शुदा, बच्चो वाले, शराब नहीं पीने वाले और गैर अपराधी लोगों को नहीं दे पायेंगे | इससे समय के साथ आपके मकान की कीमत कम हो जाएगी | याद रखिये इस नुकसान का जो आप दुसरे किरायदार से किराया ले रहे हैं उससे कोई लेना देना नहीं है | इसके इलावा अगर दोनों मकान आसपास हैं तो हो सकता है की अच्छे किरायदार सरकार द्वारा भेजे गए किरायदारों के साथ वाले घर में रहने को तैयार न हों |
  • स्कूल का नजरिया है की अब स्कूल के मालिक अपने स्कूल को “उत्तम” “अमीरों के लिए” या “किफायती “ कह कर बढ़ावा नहीं दे सकते |
  • “तो क्या हुआ की ये नियम सिर्फ हिन्दू स्कूल के लिए है ?”कम से कम हिन्दू स्कूल पर तो गरीबों को अच्छी शिक्षा देने का दबाव है जो की एक अच्छी बात है
  • एक ऐसा नियम जो सिर्फ एक गुट पर मान्य है ज़रूरी नहीं की अधूरे फायदे दे | ये ऐसी बात है जो आम लोग नहीं समझ पाते हैं | मान लीजिये दो रेस्टोरेंट हैं | एक का संचालक हिन्दू है एक का ईसाई | सरकार कहती है की सिर्फ हिन्दू वाले रेस्टोरेंट पर खाने और सेहत के परिक्षण होंगे और ईसाई रेस्टोरेंट इस से बरी है | ऊपर से हिन्दू रेस्टोरेंट सिर्ग सरकार द्वारा तय की गयी मेनू और कीमतों का पालन कर सकता है ताकि गरीब लोग भी वहां पर खा सकें |
  • ये तो कोई भी अंदाज़ लगा लेगा की हिन्दू संचालक के रेस्टोरेंट को जल्दी ही अपना व्यवसाय या तो बंद करना पड़ेगा या फिर एक ईसाई को बेच देना पड़ेगा | स्कूल के साथ भी कुछ ऐसे ही हालात हैं |
  • स्कूल बंद कर देने से किसी की सहायता नहीं होती | उल्टा वह पूरे समाज का नुकसान करता है |
  • ये नियम पारित कैसे हुआ
  • ये क़ानून बहुत कम बहस के साथ सिर्फ सबसे पहले लिखे गए मुद्दे की वजह से पारित हो गया | इस देश के बुद्धि जीवी में इस कानून में मोजूद धार्मिक भेदभाव को सामने लेन की हिम्मत नहीं थी या शायद उस समय का विपक्ष ही नाकाबिल था |
  • पर अब समय बदल रहा है | इस एक मुद्दे पर कई लोग अपने विचार प्रकट कर रहे हैं | स्वराज्य जैसे कई बड़ी पत्रिकाएँ इस मुद्दे के बारे में नियमित तौर पर लिख रही हैं |
  • इस कानून को ले कर मचता हुआ  शोर आजकल के समय में सबसे सकरात्मक राजनितिक विवादों में से एक है | शिक्षा का अधिकार (RTE) के कानून का विरोध समानता , निजी संपत्ति के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और कम सरकारी हस्तक्षेप के आधारों पर किया जा रहा है | ये मुद्दे समय के साथ और बढ़ेंगे और मुख्य धारा में आ जायेंगे | इस से सभी धार्मिक दलों को भावनात्मक दलीलें न दे कर स्पष्ट सिद्धांतों पर अपना रवैय्या पेश करना होगा |