मंदिरों का सत्य

भारतीय समाज में मंदिर का निर्माण और मूर्तियों का पूजन कब शुरू हुई ये अभी तक एक रहस्य बना हुआ है | ये भी सच है की वैदिक काल में मूर्ति पूजन नहीं हुआ करता था | तब सभी लोग एक शिला पर खड़े हो ब्रह्म का आह्वान करते थे |इसके इलावा यज्ञों द्वारा भी प्रभु की पूजा अर्चना की जाती थी | शिवलिंग का पूजन तो तब भी प्रचलन में था |उस समय के ऋषि जंगल में अपना घर बना तपस्या कर अपना जीवन व्यतीत करते थे | हांलाकि लोग सभी देवी देवताओं का पूजन करते थे लेकिन वह मंदिरों में जाकर नहीं होता था | आईये जानते हैं मंदिरों से जुडी और ऐसी कई रोचक बातें |
• मंदिर का अर्थ है मन से दूर कोई जगह |मंदिर का अर्थ घर या उसे कई स्थानों पर द्वार भी कहा जाता है |इसे कई स्थानों पर आलय नाम भी दिया गया है |द्वारा में किसी भगवान या गुरु की पूजा होती है वहीँ आलय में सिर्फ शिवजी का पूजन हो सकता है | इसके इलावा स्तूप या मदिर ध्यान या साधना के लिए होता है |मन से दूर रहकर इश्वर की जहाँ पूजा हो सके उसे मंदिर का नाम दिया गया है | जिस प्रकार हम मंदिर में घुसने से पहले जूतों को उतार देते हैं उसी प्रकार हमें अपने मन से सारी बुराई को निकाल कर अन्दर प्रवेश करना चाहिए |
• प्राचीन काल में प्रार्थना के स्थल के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता था |अगर आप उस काल में बने मंदिरों की वास्तुकला पर ध्यान देंगे तो आपको एहसास होगा की उनमें से सभी अक्सर पिरामिड के आकार में होते थे |इसके इलावा कृषि मुनियों की कुटिया और कुछ घरों का निर्माण भी इसी शैली में होता था |इसके बाद रोमन,चीन और अरब वास्तुकला का प्रभाव भारतीय निर्माण कला में होने लगा और मंदिरों के निर्माण की शैली में परिवर्तन आने लगा |प्राचीन काल में मंदिर के स्तंभों इत्यादि पर ही मूर्ति प्रतिष्ठित की जाती थी | उस मंदिर में पूजा नहीं होती थी |वह सिर्फ ध्यान या मनन के स्थान हुआ करते थे |मध्यकालीन युग में पूजा में मनमानी करने का चलन शुरू हुआ जब लोगों ने आरती और पूजा के नए तरीके शुरू कर दिए |


• मंदिर में घंटी लगाने के दो मकसद होते थे | एक तो घंटी बजा सब को प्रार्थना के लिए बुलाना और दूसरा सकरात्मक वातावरण का निर्माण करना |शुरुआत में नाद बजा कर भी इसी प्रकार के माहौल का निर्माण किया जाता था |जिन स्थानों पर नियमित रूप से मंदिर की घंटी बजने की ध्वनि आती है वहां से नकरात्मक उर्जा और सोच लुप्त हो जाती है |नक्रत्मकता हटने से समृद्धि का प्रवेश होता है | ऐसा भी माना जाता है की प्रलयकाल में नाद की गूँज सुनाई देगी यानि घंटे काल का प्रतीक भी माना जा सकता है |
• मंदिर उर्जा के केंद्र होते थे | अक्सर उनका निर्माण ऐसे स्थानों पर किया जाता था जहाँ ऐसा चुम्बकीय असर काफी ज्यादा हो |यहाँ तक की मंदिर के भीतर भी मूर्तियाँ ऐसे स्थान पर रखी जाती थीं जहाँ चुम्बकीय प्रभाव अधिक हो |ताम्बे का भी इसी मकसद से मंदिर के निर्माण में काफी इस्तेमाल किया जाता था | जो व्यक्ति मंदिर की मूर्ति की परिक्रमा करता था उसे ये सकरात्मक तरंगे एक नयी उर्जा प्रदान करती थी |मंदिर के शिखर से टकराकर ये तरंगे अक्सर व्यक्ति के ऊपर पड़ती थी और उसे असीम सुख का अनुभव कराती थीं |
• रामायण काल में भी मंदिर होते थे | इस बात का सबूत है शादी से पहले सीता जी का मंदिर जा गौरी माँ की पूजा करना |इसके इलावा महाभारत में रुक्मिणी कृष्ण और सुभद्रा अर्जुन ने भागते समय गौरी माँ के मंदिर में रुक कर पूजन किया था |जहाँ तक जानकारी प्राप्त है बिहार में मुंडेश्वरी देवी का मंदिर सबसे प्राचीन है |सोमनाथ के मंदिर का उल्लेख भी आपको ऋग्वेद में मिलता था जिस कारण ये पता चलता है की तब मंदिर का निर्माण होना शुरू हो गया था |मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन से काफी मंदिर नष्ट कर दिए गए | बाहर के देश जैसे इंडोनेशिया ,मलेशिया इत्यादि में इसीलिए अब नाम मात्र मंदिर ही बचे हैं |


• अन्य धार्मिक स्थलों की तरह मंदिरों के भी कुछ ऐसे नियम होते हैं जिनका पालन करना बेहद ज़रूरी होता है | अगर आप मंदिर में मोबाइल देख रहे हैं या आपका ध्यान कहीं और है तो निश्चित रूप से आपको ऐसी पूजा का फल नहीं प्राप्त होगा |भविष्य पूरण के मुताबिक मंदिर में जब भी पूजा करने जाएँ तो आपका व्यव्हार और आचमन पवित्र होना चाहिए |आचमन करने के लिए हाथ मुंह धो कर आसन लगा उत्तर की दिशा की तरफ मुंह कर के बैठें |दोनों पैरों को बराबर रख जल से फिर आचमन करें |
• हर देवता की पूजा का दिन निश्चित है | तो जहाँ सोमवार को शिव की ,मंगल को हनुमान,बुधवार को दुर्गा ,शुक्रवार को काली और लक्ष्मी और रविवार को विष्णु की पूजा करनी चाहिए गुरुवार को गुरुओं का दिन माना जाता है |गुरुवार को इसलिए भी श्रेष्ठ मानते हैं क्यूंकि उसकी दिशा इशान है जो की देवताओं की दिशा मानी जाती है |इस दिन किये गए किसी भी धार्मिक कार्य को मान्यता प्राप्त होती है |हिन्दू मंदिरों में जाने का एक समय होता है | तारों और सूर्य से रहित संध्या का समय मंदिर दर्शन के लिए उपयुक्त माना गया है | इसके इलावा 12 से 4 बजे तक मंदिर को बंद रखा जाता है और इसमें दर्शन करना निषेध है | इसलिए अगर मंदिर जाना है तो सुबह 11 बजे से पहले या शाम 4 बजे के बाद ही जाएँ |
• संध्योपासना के 4 प्रकार हैं- (1) प्रार्थना, (2) ध्यान, (3) कीर्तन और (4) पूजा-आरती। जिसको जैसी पूजा भाती है वह वैसे करता है |
प्रार्थना –इसमें बहुत शक्ति होती है और ये आपके जीवन में सक्रत्मकता लेकर आएगी |इसके इलावा प्रार्थना से आप इश्वर तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं|

ध्यान –ध्यान यानि जागरूकता ,अपने आसपास घट रही चीज़ों पर ध्यान देना |ध्यान से मनोकामनाएं पूरी होती है और मोक्ष भी हासिल होता है |
कीर्तन –अपने इश्वर के प्रति भावों को संगीतमय रूप से प्रस्तुत करना भजन कहलाता है |लेकिन इसमें भी ध्यान देने वाली बात है की फिल्मों के तर्ज़ पर बने भजन उपयुक्त नहीं है | भजन हमेशा शास्त्रीय संगीत पर आधारित होने चाहिए |

आरती –इसे करने से मंदिर की पी एच वैल्यू बढती है |इस का असर इन्सान की सोच पर भी होता है |ऐसा करने से व्यक्ति सभी बीमारियों से दूर रहता है |

• प्रार्थना का महत्त्व और असर तभी ज्यादा होता है जब ये किसी मंदिर के अन्दर किया जाए | ऐसा इसलिए क्यूंकि जब आप बाहर बैठ पूजन करते हैं तो उससे उभरी उर्जा आसमान में कहीं बिखर जाती है | लेकिन वहीं अगर आप मंदिर में बैठ कर प्रार्थना करें तो गुम्बद का आकार होने के कारण वह तरंगें टकरा के व्यक्ति के आसपास सकरात्मक उर्जा का सर्किल निर्मित हो जाता है | ये उर्जा का केंद्र व्यक्ति को और प्रेरित करता है |

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